मेरे घर की रौशनी
तुम्हारा इंतज़ार था तुम आ गई मेरे घर की रौशनी, तुम्हारी मासूम निगाहें जब खुलती है तो टिमटिमाने लगती है आकाश-गंगा इस छोटे से कमरे में, तुम्हारे नन्हें लबों पर अनजाने छिटकी हँसी दिन और देह की थकान चुरा लेती है घर की रौशनी, तुम्हारे नन्हें-नन्हें हाथों...
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अपराजिता
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[19 Jun 2009 21:28 PM]



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