मुरली तेरा मुरलीधर 7

अखिलं मधुरम् जाग न जाने कब वह आकर खटका देगा पट मधुकर सतत सजगता से ही निर्जल होता अहमिति का निर्झर मूढ़ विस्मरण में निद्रा में मिलन यामिनी दे न बिता टेर रहा विस्मरणविनाशा मुरली तेरा मुरलीधर।।46।। क्या स्वाधीन कभीं रह सकता क्षुद्र भोग भोगी मधुकर क्षणभंगुर वासना बीच... [पूरी पोस्ट]
writer हिमांशु । Himanshu
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[19 Jun 2009 20:07 PM]

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