नदी नहा कर पोछ रही बदन --- (शब्द चित्र)

TRUTH (Collection of my poems) मुहअंधेरे - भोर में, नदी नहा कर पोंछ रही थी बदन सूरज की आँख खुल गयी नज़ारा देख शर्म से लाल हुआ बढ़ने लगी तपन ------------------- हवाएं सरसराते हुए चुपके से शाखों को झुला रहीं थी झूला सूरज ने देख लिया हो रहा है -- आगबबूला... [पूरी पोस्ट]
writer M VERMA
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[19 Jun 2009 11:12 AM]

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