क्यों अमृत में गरल घोलते [कविता] - अमिता 'नीर'
महामौन तुम नहीं बोलते क्यों अमृत में गरल घोलते तुम्हें नहीं बहला पाते हैं रातें चन्द्रकिरण रस भीनी ये हिमवर्षी सुन्दर दिन अतिरंजित सपनें मानव के क्यों ले मन के विजन डोलते महामौन तुम नहीं बोलते क्यों अमृत में गरल घोलते अरे ! मौन ये भी अच्छा है अंधकार...
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श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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[19 Jun 2009 04:06 AM]



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