नींद न टूटे जब राजा की आहों से, कोलाहल से व्याकुल होकर जनता तब महलों में आग लगाती है

कुछ शब्द चित्र गूगल से साभार) गुरूदेव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार एक गज़ल पेश है। पढ़ें और बतायें- इक तो टूटा छप्पर तिस पर मौसम भी बरसाती है प्यास बुझानेवाली बदली अब तो दिल दहलाती है याद तुम्हारी चिड़िया जैसी दिल मेरा है नीड़ हुआ सारा दिन गायब रहती पर शाम... [पूरी पोस्ट]
writer रविकांत पाण्डेय
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[18 Jun 2009 05:49 AM]

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