बात जो दिल में थी आज फिर..दिल ही में रह गयी....
कहना था कुछ , क्या कहना था, जाने क्या कह गयी, बात जो दिल में थी आज फिर, दिल ही में रह गयी , क्यूँ रुक रुक के लिखती हूँ मैं, क्यूँ हकलाऊं इतना, वो पर्वत सी हिम्मत मेरी रेत सी क्यूँ ढह गयी ? किस साहिल से टकराऊंगी, छोड़ किनारा अपना, डरती हूँ जो इस ज्वार...
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kavitaprayas
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[17 Jun 2009 18:37 PM]



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