तेरे हाथों के लिखे खत मैं जलाता कैसे......

उनींदरा गंगा मेरे घर से बहुत दूर थी। कई शहर दूर। उसके खतों को गंगा के हवाले नहीं कर सकता था। जला सकता था लेकिन जगजीत  और रहबर साहब  बार-बार आड़े आते रहे। तेरे खु़शबू में बसे खत मैं जलाता कैसे...शायद सौवीं बार मैं इस नज्म को सुन रहा था। हर बार आंख भर... [पूरी पोस्ट]
writer शायदा
views
47
upvote
5
downvote
0
rating
5
comments
5
[16 Jun 2009 17:56 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix