एक चुराई हुई कविता...
यह कविता मैंने चुराई है उस फटे-पुराने बूढ़े से जो मदरडेयरी के पुल पर सड़क किनारे छतरी ताने बैठा रहता है, एक मैले से चादरनुमा कपड़े पर पान-मसाले के पैकिट बिछाए। चिलचिलाती धूप और तेज़ बारिश में उसकी छतरी के छेदों से अक्सर झरती है...कविता। यह कविता मैंन...
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विवेक
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[16 Jun 2009 06:48 AM]



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