मैं पूजा की थाली, का एक फूल हूं...
फोटो गूगल से साभार) श्वास की हर ऋचा है, समर्पित तुम्हे अब कहां शेष रहती, कोई साधना रूप -जल से नहाकर, नयन तृप्त हैं हो गई आज पूरी, हर इक कामना याद दीपक बनी जब, डंसा रात ने विष से मुक्ति दिलाई, सुमधुर बात ने छू दिया तुमने और, मैं सोना हुआ कि मान मेरा ब...
[पूरी पोस्ट]
रविकांत पाण्डेय
21
2
0
2
15
[16 Jun 2009 02:52 AM]



Shuffle








