किसी से नही, एक तुमसे......

हृदय गवाक्ष किसी से नही, एक तुमसे निभाने की खातिर, जली मैं युगों से युगों तक किसी को नही हर किसी शख्स में है किया याद तुमको निशा से सुबह तक तुम्ही आदि में हो, तुम्ही अंत मे हो, तुम्ही मंजिलों में तुम्ही पंथ में हो, नही दीखते तुम कहीं भी तो क्या है? खुली आँख में... [पूरी पोस्ट]
writer कंचन सिंह चौहान
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[16 Jun 2009 00:29 AM]

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