अनुरक्ति

अनुरक्ति ग़ज़ल .......................... वहीं तक पाँव हैं मेरे , जहाँ तक है दरी मेरी ! इसी में सब समेटा है , यही जादूगरी मेरी !! हमें निस्बत गुलाबों से , वो है गुलकंद का हामी ! बचेगी पाँखुरी कैसे , किताबों में धरी मेरी ? खरी तो सुन नहीं सकते , किताबों से दबे... [पूरी पोस्ट]
writer ललितमोहन त्रिवेदी
views
25
upvote
4
downvote
0
rating
4
comments
14
[14 Jun 2009 11:54 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix