अनुरक्ति
ग़ज़ल .......................... वहीं तक पाँव हैं मेरे , जहाँ तक है दरी मेरी ! इसी में सब समेटा है , यही जादूगरी मेरी !! हमें निस्बत गुलाबों से , वो है गुलकंद का हामी ! बचेगी पाँखुरी कैसे , किताबों में धरी मेरी ? खरी तो सुन नहीं सकते , किताबों से दबे...
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ललितमोहन त्रिवेदी
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[14 Jun 2009 11:54 AM]



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