बदल बन जायें

kuch kavitayen kuch hain geet आओ हम बादल बन जायें । प्रेम की रिमझिम फुहारों से , धो डालें उस धूल को , जो वृक्षों के पत्तों पर , फूलों पर , डालों पर जम गई है । और जमी है , हम सब के अन्तर में , कटुता बन कर । आओ हम बादल बन जायें आओ हम बादल बन जायें । ताकि भुला सकें हम आपस का वैमनस्य... [पूरी पोस्ट]
writer सीमा रानी
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[13 Jun 2009 11:48 AM]

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