दास्तान दाढ़ी की
बंगलौर आया तो दिनचर्या पूरी बदल गई। सुबह उठकर रोजमर्रा के कामों से निपटकर तैयार होकर साढ़े आठ बजे तक दफ्तर पहुंचने की जल्दी। उधर शाम को छह बजे दफ्तर से निकलने पर खरामा-खरामा कदमों से घर पहुंचना । साथी जो कुछ भी खाना बना रहे हों, उनकी मदद करना। खाना...
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राजेश उत्साही
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[13 Jun 2009 10:58 AM]



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