घर मेरे उसने जो आना चाहा.
ग़ज़ल घर मेरे उसने जो आना चाहा. रास्ता सबने भुलाना चाहा. और भी सर पे चढ़ गये अपने, हमने उनको जो मनाना चाहा. कान पर हाथ रख लिए उसने, हमने दुखड़ा जो सुनाना चाहा. तोड़ने का रहा जुनूं उसको, हमने रिश्ता तो निभाना चाहा. राज़ सब पर अयां ना हो जाये, हमने ज़ख...
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डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[12 Jun 2009 14:53 PM]



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