सुचित्रा फिल्म सोसाइटी
यह असफल सा प्रयास है अपने वर्तमान को अतीत की तरह टटोलने का। यदि बैंगलोर कभी अपना डेरा उठ जाए तो क्या ऐसा होगा जो मेरी स्मृति में बसा रह जाएगा। जाहिर तौर बारिश, बारिश और बारिश। हर शाम क्षितिज से उमड़ते काले बादल और उनमें बिजली कि हल्की कौंध। हवा, हवा...
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[12 Jun 2009 08:22 AM]



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