उस पार मुझे तुम ले जाना!

मीत घट बहता यूँ, ज्यों तृष हो, ना जानू, कौन हश्र होगा, चिंतित है कैसे हो तरण, अब कौन किनार ठहर होगा, जीवन-तरणी की तुम्हीं प्रिये, पुलकित पतवार बन जाना मैं नश्वर, अंधक नहरम हूँ, उस पार मुझे तुम ले जाना! हैं चहुँओर भंवर गहरे, हर वक्त सधे मुझ पर पहरे, ना बे... [पूरी पोस्ट]
writer मीत
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[12 Jun 2009 03:18 AM]

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