एक गीत : तुम बिना पढ़े ....
तुम बिना पढ़े लौटा दी मेरी आत्मकथा 'आवरण' देख पुस्तक पढ़ने की आदी हो तुम फूलों का रंगों से मोल लगाती हो मैं भीनी-भीनी खुशबू का आभारी हूँ तुम सजी-सजाई दुकानों की ग्राहक हो मैं प्यार बेचता गली-गली व्यापारी हूँ तुम सुन न सकोगी मेरी अग्नि-शिखा गीतें तुम र...
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आनन्द पाठक
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[11 Jun 2009 11:42 AM]



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