चैराहे नहीं रहे अब वैसे

कोलाहल चैराहे नहीं रहे अब वैसे पहले से अल्हड, ठहरे-ठहरे से हर ओर मची है भागमभाग आदमी भाग रहा है, सडकें भाग रही हैं पीछे-पीछे भाग रहा है चैराहा । नेता जी को जरूरत नहीं पड़ती, आने की अब चैराहे पर कि जनता से जुड़ने की जरूरत ही नहीं रही सियासत के रंग-ढंग दोनों ही... [पूरी पोस्ट]
writer kaustubh
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[10 Jun 2009 09:15 AM]

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