नये जमाने में प्रेम

तिश्नगी मेरे एक पड़ोसी के मित्र चंपूलाल जी इन दिनों बड़े परेशान चल रहे थे। यह बात मैं पहली ही नजर में भांप गया था। उनका सदाबहार हंसता-मुस्कुराता चेहरा सूख गया था। ठीक उसी तरह जसे हमारे गांव की नदी गर्मियों में हो जाती है! मैंने एक दिन चंपूलाल जी से इसका कारण... [पूरी पोस्ट]
writer अखिलेश चंद्र
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[10 Jun 2009 06:37 AM]

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