रोज़ मर्रा सा कुछ....

मौन में बात.. खुला हुआ कुछ नहीं है सामने , एक बंधे हुए से कमरे में बैठा हूँ ... बाहर धूमकर आता हूँ ... फिर बैठा रहता हूँ ... शहर एक अजनबीपन की चादर ओढ़े रहता है ... बाहर जाते ही पर्यटक सा महसूस करता हूँ सो भागकर वापिस अपने दड़बे में धुस आता हूँ ... । बिखरा हुआ सा... [पूरी पोस्ट]
writer मानव
views
19
upvote
2
downvote
0
rating
2
comments
3
[10 Jun 2009 03:43 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix