चिरकुटों के चंगुल में हिन्दी - 3 ‘अंतिम ’

कोलाहल पत्र-पत्रिकाओं, संपादकों, लेखकों की करनी-धरनी के बाद बात करते हैं पुरस्कारों की । इस मामले में तो हिन्दी में चिरकुटई चरम पर नजर आती है । पुरस्कारों के लिए दिल्ली में कैसी-कैसी जोड़-तोड़, खींचतान, दांव-पेच और लाबींग की जाती है वह साहित्य की गलियों में भ... [पूरी पोस्ट]
writer kaustubh

हिन्दी-विमर्श

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[09 Jun 2009 09:25 AM]

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