हबीब दा से आखिरी बातचीत
वालिद की वसीयत पूरी करने का सुकून यकीनन पहाड़ टूटा है। हकीकत इतनी ही ठोस और बेरहम होती है। सोमवार की सुबह सूरज अंधियारा लेकर उगा था। हबीब साहब के इंतकाल के बाद वक्त थम गया। हंसी रुक गई। उम्मीद ठहर गई। अंधेरा छटा तो हौसला मुस्कुराया, कि लोक की आस्था मे...
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सचिन ..........
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[09 Jun 2009 03:15 AM]



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