कभी कभार ढहना सीखो ---------
सच्चाई को कहना सीखो सच्चाई को सहना सीखो बुलंदी के अभिलाषी हैं तो कभी कभार ढहना सीखो उजड़ गए हैं घर तो क्या चौराहों पर रहना सीखो पत्थर - पत्थर छूकर गुज़रो पानी - पानी बहना सीखो...
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Razia
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[08 Jun 2009 21:03 PM]



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