ज़िन्दगी !

apni baat!  Umesh Pathak ke saath. उमेश पाठक कछुए वाली खोल जिन्दगी, गले पड़ी सी ढोल जिंदगी ! रोजी -रोटी के सवाल पर, पढ़ती है भूगोल जिन्दगी ऊपर से हसती -मुस्काती , भीतर पोलमपोल जिन्दगी ! ख़ुद से भी बातें करने में , करती टाल-मटोल जिन्दगी ! न जाने कब बीच सफ़र में , करे बिस्तरा गोल जिन्दगी... [पूरी पोस्ट]
writer Umesh Pathak / उमेश पाठक
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[07 Jun 2009 09:52 AM]

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