समय का भंवर--'चिट्ठी न कोई संदेस'

मेरी कविताएँ [Meri Kavitayen] अक्सर सभी के साथ ऐसा होता होगा जब अपनी राह चलते चलते हम ठिठक कर रुक जाते हैं,मुड कर देखते हैं ,कोई नज़र आता नहीं ...कितने लोग सफ़र में साथ चले तो थे मगर वे अपनी अपनी राह पर ऐसे गए कि फिर कभी मिले ही नहीं. एक ग़ज़ल आनंद बक्शी साहब की लिखी हुई--'चिट्ठी... [पूरी पोस्ट]
writer अल्पना वर्मा
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[07 Jun 2009 04:00 AM]

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