जिन्‍दगी बिखरा कथानक हो गई

गुल्लक कभी - कभी कोई चेहरा, कोई घटना, कोई बात इस तरह दिल को छू जाती है कि ताउम्र पीछा नहीं छोड़ती। बात 1975 के आसपास की है। तब मैं ग्‍यारहवीं का विद्यार्थी था। इटारसी में रहता था। कविताएं लिखना शुरू कर चुका था। कादम्बिनी पत्रिका का एक कालम था जिसमें उभरते र... [पूरी पोस्ट]
writer राजेश उत्‍साही
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[06 Jun 2009 07:02 AM]

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