अपने शहर में
नसीब-ए-दर्द किसीसे ,हम कहना नहीं चाहते अब अपने शहर में दिल-ए-सोज़ ,हम रहना नहीं चाहते ! हमने देखी है वफ़ा की आड़ में,बेवफाई उनकी इस अफसाने को अब ,हम कहना नहीं चाहते अब अपने शहर में दिल-ए-सोज़ ,हम रहना नहीं चाहते ! न समझें जज़्बात वो हमारे ,तो कोई बात न...
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शिवानी
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[06 Jun 2009 04:39 AM]



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