अब सावन नहीं आता है, वहां

हिमाल : अपना-पहाड़ अब सावन नहीं आता है, वहां वो सालों पहले आया था, अंतिम बार तब वहां घने झुरमुट थे राह नहीं सूझती थी पक्षी चहचहाते थे वनराज गरजते थे वहां ।। ठंडी छांव में, नदी के किनारे हम भी बैठे थे कभी घंटो बाते की थी कई बार दुखी होकर इसी जगह पर मैं लेट गया था कई बार... [पूरी पोस्ट]
writer जितेंद्र भट्ट
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[05 Jun 2009 12:12 PM]

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