गर्जन-तर्जन
मानिक बच्छावत की एक कविता गर्जन-तर्जन बहुत जोर से
बोले थे तुम
गरजे थे तुम
बरसे थे तुम फिर तुम रुके
तुमने देखा
जहां तुम खड़े थे
वहीं तुम खड़े थे कहीं कुछ नहीं हुआ
तुम्हारी बातों ने
किसी को नहीं छुआ । *****
(काव्य संकलन ’पीड़ित चेहरों का मर्म’ से साभार)...
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PRIYANKAR
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[05 Jun 2009 09:44 AM]



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