चिरकुटों के चंगुल में हिन्दी- 1

कोलाहल आज हिन्दी दिवस नहीं है! जानता हूं भई। फिर क्यों रो रहा हूं हिन्दी के नाम पर । अरे भाई मैं कोई बुद्धिजीवी, विद्वान या साहित्यकार नहीं जो मौका देख कर आंसू बहाउूं, वह भी महज मंच पर । आम आदमी हूं । वो तो ससुरा रोज ही रोता है कभी खुद पर, कभी घर-परिवार पर... [पूरी पोस्ट]
writer kaustubh
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[04 Jun 2009 03:38 AM]

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