आखिर बेच डाली छह सौ किलो रद्दी
कई शौक भारी पड़ जाते है। ऐसा ही है मेरा और अखबार का रिश्ता। खाना मिले न मिले अखबार जरूर हो। मेरे इस प्रेम के चक्कर में मेरे बिस्तर के चारों और हमेशा अखबारों का ढेर होता है। मेरे सारे परिचित और दोस्त इससे वाकिफ है। हाल तक मैं जिस मकान में रहता था वहां...
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राजीव जैन Rajeev Jain
जिंदगी लाइव
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[03 Jun 2009 16:49 PM]



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