आखिरी आदमी का गीतासार
देखा तुमने! हवा कैसे हमें बिना छुए बढ़ गई ! पसीने में भीगे बदन की गंध अब उसे पसंद नहीं। सड़क भी दौड़ पड़ी हमारे नंगे पांवों तले से निकलकर रबर के टायरों और नर्म ब्रैंडेड जूतों की चाह में। हमारे मुफ्त के आराम के डर से पेड़ों ने छिपा ली है छांव, महंगे र...
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विवेक
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[03 Jun 2009 09:48 AM]



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