इतिहास हंता मैं
एकालाप इतिहास हंता मैंमैं घर से निकल आई थीतुम्हें पाने को ,मैंने धरम की दीवार गिराई थीतुम्हें पाने को,अपने पिता से आँख मिलाई थी -भाई से ज़बान लड़ाई थी -तुम्हें पाने को!माँ अपनी कोख नाखूनों से नोंचती रह गई ,पिता ने जीते जी मेरा श्राद्ध कर दिया;मैंने म...
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कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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[02 Jun 2009 15:59 PM]



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