नौकर की कमीज पढ़ते हुए…

आवारा हूँ ... विनोद कुमार शुक्ल का ’नौकर की कमीज’ पढ़ते हुए… यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने, तो यह घर से खास बाहर निकलना नहीं था. क्योंकि मुझे वापस लौटकर आना था. और इस बात की पूरी कोशिश करके कि काम पूरा हो, यानी पान खाकर. घर बाहर जाने के लिए उतन... [पूरी पोस्ट]
writer मिहिर
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[08 Apr 2009 13:40 PM]

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