वक़्त के पहिंयो से बंधी मुजरिम रूहे
उसने ओर मैंने साइकिल से मोटरसाइकिल का सफ़र साथ तय किया है .....पोस्ट ऑफिस के बाहर कितने कम्पीटीशन के फार्मो पर डाक टिकट लगाकर रजिस्ट्री करायी है .. बाद के कई सालो को हमने जुदा- जुदा तरीके से लांघा है .बीच में जब कभी फुरसत मिली हमने मन की परतो को उधेड...
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डॉ .अनुराग
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[01 Jun 2009 09:31 AM]



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