चलो क्षितिज तक साथ चलें
चलो क्षितिज तक साथ चलें थाम हाथों को हाथ चलें सफर की हो न थकान कदमताल जब हो समान जब तक तन में हो प्राण बस यूं ही दिन रात चलें चलो क्षितिज तक साथ चलें ना कुछ पाने का संकल्प हो ना कुछ खोने का विकल्प हो ना रूठने मनाने का प्रपंच हो बस यूं ही मस्त हाल...
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भारत मल्होत्रा
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[01 Jun 2009 08:16 AM]



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