एक गीत : मालूम था मेरी देहरी ....
मालूम था मेरी देहरी को ठुकरा कर चल जाना है फिर भी तेरे स्वागत में है वन्दनवार सजाए || ऋचा-मन्त्र से आह्वान पर आह्वान करता हूँ हवन-कुण्ड में आकांक्षा की समिधा देता हूँ वही प्रतीक्षारत हैं आँखे कल भी आज वही मुझको क्या मालूम नहीं था शर्ते आने की ! मालूम...
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आनन्द पाठक
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[30 May 2009 12:32 PM]



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