ग़ज़ल
वही हालात हैं बदला हुआ कुछ भी नहीं है. वही चेहरे वही किस्से नया कुछ भी नहीं है. पुराने लोग हैं कुछ जो नज़र आते हैं वरना, नयी तहज़ीब में तहज़ीब सा कुछ भी नहीं है. बहुत बेचैन होता हूँ मैं जब भी सोचता हूँ, यहाँ इस मुल्क़ में अब मुल्क़ सा कुछ भी नहीं है....
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संजीव गौतम
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[29 May 2009 23:58 PM]



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