एक छोटी सी ग़ज़ल
एक छोटी सी ग़ज़ल गर ज़मीं आशियाँ बनाने को- तो फलक बिजलियाँ गिराने को। किस तरह से कहें फ़साने को, हर तरह उज्र है ज़माने को। हमने चाहा है अश्क मिल जाए- दर्द ये अपना कहीं छुपाने को। उन गुलों को मसल दिया उसने- जो मिले थे शहर सजाने को। एक इंसान की ज़रूरत है-...
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आनंदकृष्ण
ग़ज़ल
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[29 May 2009 04:58 AM]



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