धर्म कोई निजी परिघटना नहीं है

कुमार अम्‍बुज मित्रो, 'धर्म का विकल्‍प: एक पुनर्विचार' शीर्षक लेख की यह दूसरी किश्‍त। धर्म कोई निजी मान्यता या परिघटना नहीं है जो कहते हैं कि धर्म एक निजी आस्था, विश्वास और मान्यता की बात है। वे दरअसल भोले हैं या चालाक। जैसे भ्रष्टाचार, ईमानदारी, बेईमानी, चरित्रही... [पूरी पोस्ट]
writer कुमार अम्‍बुज

हिंसा

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[29 May 2009 03:46 AM]

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