हौले हौले जहर कोई जिस्म में घुलता रहा...
सुनिये एक और गज़ल। गुरूदेव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद के बिना इसे पूरा करना संभव नहीं था। मुश्किलों से राह की हंस कर गले मिलता रहा मैं कि था बस इक मुसाफ़िर उम्र-भर चलता रहा सत्य के उपदेश का व्यापार करते जो रहे झूठ उनके साये में ही फूलता फलता रहा दुख म...
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रविकांत पाण्डेय
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[29 May 2009 02:09 AM]



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