यूँ हस्ती मिटा कर ....

prosing गूरू जी के आर्शीवाद से छोटी बह'र की एक और ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ... आप सभी का प्यार और आर्शीवाद चाहूंगा... बह'र - १२२ १२२ मैं खुश हूँ उड़ा कर । यूँ हस्ती मिटा कर ॥ ये कैसे कहूँ मैं , हूँ जिंदा भुला कर ॥ वो आया नहीं क्यों , बता दो पता कर ॥ सूना फैसला अब... [पूरी पोस्ट]
writer "अर्श"
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[28 May 2009 23:52 PM]

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