वसंत के बाद पतझड़...
सुनो! पुरानी टहनी जोर से ना हिलाओ उसकी सारी पत्तियां ना गिराओ सिर्फ धरकनो को सही प्रकृति को ना आंसू पिलाओ कदमो के नीचे की जमींन मांग आँखों को ना धूल दिखाओ देखो! वो तने से लिपटी लता ऊपर बयाँ का घोंसला शाखा पर अटकी पतंग छाया में खिली हमारी सुगंध ना दो...
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neera
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[28 May 2009 17:52 PM]



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