स्वप्न यूँ मरते नहीं हैं
हो गया इतिहास लोहित यदि हमारे ही लहू से है खड़ा विकराल अरि द्रुत छीनता विश्रान्ति भू से बादलों की हूक से पर्वत-हृदय डरते नहीं हैं स्वप्न यूँ मरते नहीं हैं तीन रंगों से बनी जो है वही तस्वीर प्यासी भारती के चक्षु कोरों पर उगी कोई उदासी किंतु ये मोती पि...
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Alok Shankar
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[28 May 2009 07:27 AM]



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