दीवार के उस पार
सँझा की बेला थी कल कोई यूँ आ खडा हुआ देहरी पर कि झट तुम्हारी याद से भीग गया मैं विलंबित होता है तो खुद ही चला आता है तुम्हारे बारे में सोचना और कितना अप्रत्याशित होता है तुम्हें याद करना मसलन पार्क की बेंच पर बैठे गली के जवान होते बच्चे मुझे देख अचकच...
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महेन
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[27 May 2009 14:33 PM]



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