बादल सुभाग के
घिर आये हैं मेरे बादल सुभाग के साँवले सलोने से। कन्ठ से उभरते हैं सातों सुर एक साथ झंकृत हो उठता है अन्तः का तार तार। अधरों पर खेलती मोहक-अति चंचला भरती है राह में किरणे समुज्ज्वला। सघन हो बरसते हैं अमृत के बूँद बूँद मन का पपीहा अघाए बिन पीता है रात...
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प्रताप नारायण सिंह
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[27 May 2009 07:56 AM]



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