दिल तो हिदुस्तानी है मगर...
काव्य मञ्जूषा पे स्वप्न मंजूषा जी की अभिव्यक्ति "एक बार फ़िर मै पराधीन हो गई" पे मेरे अन्दर के कवि ने ४ पंक्तियों पे हाथ साफ़ कर लिया...प्रस्तुत हैं ये पंक्तियाँ स्वपन मंजूषा जी के लिए आभार सहित॥ ग्लोबलाइजेशन और देशभक्ति के द्वन्द्व में फंसे बेचारे हिन...
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राकेश
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[26 May 2009 10:45 AM]



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