इक बार तो पढ़ा होता

कहासुनी दिमाग जब खामोश होता है, तब दिल की आवाज़ मिलती है।इसलिए आज उसी आवाज़ के साथकुछ हटकर रात चांदनी की सीढियां उतरकर ख़्वाबों के आँगन में डोलतींपलकों की किवाड़ों को धकेलकर तुम भीतर आयींऔर हौले से मेरा हाथ पकड़कर उतर चलीं यादों के तहखाने मेंसीलन के बीच किसी कोन... [पूरी पोस्ट]
writer ऋषभ कृष्ण
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[26 May 2009 04:47 AM]

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