उम्र के हाथों छला गया है
आज का दिन भी नया नहीं है बचपन याद से गया नहीं है अल्हड़ है ये अब भी बेशक उम्र के हाथों छला गया है मैंने चाहा गीत मैं गा लूँ सूरज से इक किरण चुरा लूँ माथे में इक सोच बसा लूँ अंगने में सूरज जो खड़ा है प्यार का उबटन , वफ़ा की खुशबू क्यों न मैं मल-मल के न...
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शारदा अरोरा
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[26 May 2009 02:51 AM]



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