माँ

Meri Kavitayein तुम हो जीवन की बगिया में , ममता की अमृत धारा , सींच रही हो सदियों से , हर बगिया , घर आँगन सारा । हर सुबह - सुबह देखा तुमको , किरणों के संग जगते ही , कई काम लिए अपने हाथों में , बिना थके हुए करते ही । झाडू के संग सफाई हो , या फुलवारी की निराई , हर जरू... [पूरी पोस्ट]
writer Navnit Nirav
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[25 May 2009 12:15 PM]

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